लम्हे सुकून के

मिलते हैं ज़िन्दगी में लम्हे सुकून के कमतर ही जाती है थोड़ी दूर यह कश्ती ज़िन्दगी की और जस्बातों के तूफ़ान में गुम हो जाती है ।   कहते हैं इस भवँर के पार है साहिल-ए-ख़ुशी कहीं पर जाने किसी बिरले की ही नाँव वहाँ पहुँच पाती है । हम जैसों के नसीब में तो… Continue reading लम्हे सुकून के

हुमा

गुज़र चुके हैं पहले भी आतिश-ए-इश्क़ से कई बार मगर लगता है हमको भी हुमा, जलकार ज़िन्दा होने की कला आ गई   अगर मयख़ाने से पूछे कोई तो कहेगा वह भी यह-- नशा शराब का नहीं उसकी कैफ़ियत का होता है   अब तो इश्क़ का भी दस्तूर है यह, माशूक तो बस बहाना है… Continue reading हुमा

इंतज़ार

इंतज़ार यह कैसा है जो दिन छिपते ही दिल-ओ-दिमाग़ पर छा जाता है मायूसी यह कैसी है जो शाम ढलते ही हर जा सतह-ए-गर्द सी बैठ जाती है   है क्या अभी भी जो पाया नहीं पर पाने की आस बाक़ी है है कौन-सा वह ख़्वाब जिसे अब भी जीने की चाह बाक़ी है  … Continue reading इंतज़ार

पहली पहचान के परे

हमें लगता है कि हमारी पहली पहचान ही सबकुछ है, उसके पीछे कुछ नहीं है, सिर्फ़ शून्यता है । इसलिए हम इस पहचान को खोने से डरते हैं । पर सच तो यह है कि वह सिर्फ़ एक लिबास है जिसे हमारी रूह ने ही हमारे लिए चुना है ।

ज़ख़्म

जब रखा सीने पर हाथ उन्होंने तो रूह हमारी जैसे सिहर सी उठी जब उतरा गिरेबान सिर से मेरे तो सूखे ज़ख़्मों की परत जैसे उखड़ सी गई