यह ज़िन्दगी हमसे आशना न रहती…

कुछ तो बात थी उस मुलाक़ात में वरना,

रातों की नींदें यूँही उड़ा नहीं करतीं,

वे कुछ कहें न कहें, कहने की ज़रूरत ही कहाँ ?

अगर बात कहने पर आ जाती तो यह मोहब्बत ही क्या होती !

 

साथ गुज़ारा यह चन्द लम्हों का वक़्त

इस ज़िन्दगी के मायने बदलने के काबिल हो गया ।

अगर दिल की बात होठों तक भी आ जाती तो–

यह ज़िन्दगी हमसे आशना न रहती ।

 

 

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