प्रेम

प्रेम एक ऊर्जा है,

प्रेम एक भाव है,

प्रेम है असीम–

यह सारे बंधनों का अभाव है ।

 

यह प्रेम ही तो है जो जगत के कण-कण में धड़कता है,

और प्रेम ही समय के क्षण-क्षण में बरसता है,

है प्रकृति यह सारी चलायमान प्रेम से–

वह प्रेम ही तो है जो चाँद-तारों में चमकता है ।

 

प्रेम की भाषा को

ये आँखें बोलती हैं,

और दिल समझता है ।

प्रेम की भाषा को भला

मुख से कौन बोलता है ?

 

अगर प्रेम की अभिव्कक्ति शब्दों में होती है

तो कागज़ के पन्नों पर एक कविता जन्म लेती है ।

 

प्रेम है शाश्वत,

प्रेम कभी मरता नहीं,

प्रेम करने वाले गुज़र जाते हैं लेकिन,

प्रेम-चक्र कभी रुकता नहीं ।

 

हैं प्रमी लाखों करोड़ों इस जगत में,

पर प्रेम-लहर है एक जो उनमें बहा करती है ।

जो करते हैं प्रेम उनके दिल जानते हैं

कि प्रेम की ऊर्जा से ही यह सृष्टि बना-बिगड़ा करती है ।

 

 

 

3 thoughts on “प्रेम”

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