आतिश-ए-इश्क़

अब दुनिया हमें पागल भी कहे तो अफ़सोस कैसा

किसी के इश्क़ में फ़ना हो जाना क्या गुनाह है ?

गुनहगार तो वे हैं जो ग़म-ए-आशिक़ी से वाक़िफ़ हैं फिर भी

इस आशिक़ का दिल तोड़ने पर आमदा हैं ।

 

जब आतिश-ए-इश्क़ में यह रूह ही हमारी

दहक-दहककर ख़ाक हो जानी है एक दिन

तो अब जहन्नुम का डर किसको है

जहन्नुम तो महबूब के क़दमों में ही लिखा है ।

 

इस बात पर अब रंजिश कैसी ?

अपने हाल-ए-दिल पर अब अफ़सोस कैसा ?

क्या तारीख़-ए-मोहब्बत में कभी

किसी माशूक़ ने अपने आशिक़ पर रहम किया है ?

 

है इश्क़ वह शमा नेहान जिसमें

हम जैसे परवानों का जलकर ख़ाक हो जाना ही लिखा है ।

 

 

3 thoughts on “आतिश-ए-इश्क़”

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