कम्बख़्त ग़म

है रूठी मेरी मोहब्बत मुझसे

मेरी रूह भी, मेरा ख़ुदा भी,

बस ये कम्बख़्त ग़म ही हैं वफ़ादार

जो रूठने का नाम नहीं लेते ।

 

कुछ लम्हों की ख़ुशियों के लिए

न जाने कितने ग़म झेल गए

अब तो इत्तेफ़ाक हमें भी है राय-ए-माशरा से–

यह इश्क़ का चक्कर बस घाटे का सौदा है ।

2 thoughts on “कम्बख़्त ग़म”

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