ज़ख़्म

जब रखा सीने पर हाथ उन्होंने तो रूह हमारी जैसे सिहर सी उठी जब उतरा गिरेबान सिर से मेरे तो सूखे ज़ख़्मों की परत जैसे उखड़ सी गई