पहली पहचान के परे

एक पहचान वह होती है जो हम दुनिया में आते ही पाते हैं । दूसरी वह जिसे हम अपने पीछे छोड़कर इस दुनिया से रुकसत हो जाते हैं । पहली पहचान हमें हमारे पिछले कर्मों या क़िस्मत के ज़ोर से नसीब होती है, पर दूसरी को बनाने और हासिल करने में हमारा हाथ होता है । यह सच है कि पहली पहचान से मिले माँ-बाप, घर-परिवार, धर्म-संस्कार के बिना दूसरी पहचान की कल्पना भी कर पाना नामुमकिन है । लेकिन अगर हम इन्हीं रिश्ते-नातों-संस्कारों के बंधन में बँधकर अपनी पहली पहचान को ही अपनी आख़िरी पहचान मानने की भूल कर बैठे तो दुनिया में एक और ज़िन्दगी ज़ाया हो जाएगी, एक और जीवन अधूरा रह जाएगा ।

इस दुनिया में इनसान की शक़्ल-ओ-सूरत में आने का मतलब है अपनी शख़्सियत को तराशना, अपनी क़ाबिलियतों को निखारना ताकि परवरदिगार की, ईश्वर की इस तिलिस्मी दुनिया में क्या-क्या करिश्मे मुमकिन है ये सब देख सकें, और परवरदिगार की छवि की एक झलक हमारे भीतर भी दिखाई पड़े । एक अच्छा और कामयाब इनसान वही है जो हर कदम पर अपने विचारों को परखे, अपने और दूसरों के अहसासों को समझने का सतत प्रयास करे और अपनी पहली पहचान के पीछे दबी जो इंसानियत है उसकी खोज बरक़रार रखे । वही इनसान अपने और शायद दूसरों के लिए रहनुमा बन सकता है ।

दुनिया में रहनुमा तो कई हैं पर उनके रास्ते डर से शुरू होकर नफ़रत पर ख़त्म होते हैं । एक सच्चा रहनुमा तो वही होता है जो अपनी क़ाबिलियत के बलबूते पर लोगों की इज्ज़त पाए और दूसरों को भी डर और नफ़रत से नहीं बल्कि केवल अपनी शख़्सियत के दम पर हक़ और नेकी के रास्ते पर लाए । और एक अच्छा समाज वह है जो हर इनसान को अपने अंदर के बसे इनसान को और अपने हुनर को बाहर लाने का मौक़ा दे, अपनी ख़ुद की पहचान बनाने को प्रेरित करे ।

पर हमें लगता है कि हमारी पहली पहचान ही सबकुछ है, उसके पीछे कुछ नहीं है, सिर्फ़ शून्यता है । इसलिए हम इस पहचान को खोने से डरते हैं । इससे और ज़्यादा गहराई में उतरने की बजाए हम इसके ऊपर नए मुकाम और कामयाबियाँ चिपका देना चाहते हैं ताकि इस पल-पल झीनी होती पहचान को हम अपनी दौलत और शोहरत से ढक सकें । पर सच तो यह है कि जितना दूर हम अपने आप से जाते हैं और दूसरी चीज़ों के पीछे भागते हैं उतनी ही कृत्रिम उतनी ही बनावटी दुनिया हम अपने आस-पास बनाते चले जाते हैं । आज हमारे घंरौदों में टी॰वी॰, फ़्रिज, गाड़ी, पति, पत्नी, दो बच्चे–ये सब हैं । पर क्या हम अंदर से इन चीज़ों से तृप्त हैं और ख़ुश हैं ? या फिर हमारी ख़ुशी भी एक दिखावा है ।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि जहाँ एक तरफ़ हमारी दुनिया में कृत्रिमता बढ़ती जा रही है वहीं दूसरी तरफ़ डर, क्रोध और नफ़रत ने सबके ज़हन में जगह बना ली है । जब एक बच्चे को अपनी शख़सियत विकसित करने का मौक़ा नहीं दिया जाएगा, जब उसे प्रेम-भरे रिश्तों की जगह सिर्फ़ क्रोध और ज्ञल्लाहट मिलेगी, अच्छे दूध, खाने और पानी की जगह सिर्फ़ प्रदूषित और कारख़ानों में बना खाना मिलेगा तो यह ज़ाहिर से बात है कि उसके अंदर भी डर, क्रोध और नफ़रत का ही बीज स्फ़ुटित होगा और बाद में चलकर वह भी हमारी तरह ख़ुशी का ढोंग करना सीख जाएगा । वह भी यही समझेगा कि इनसान तो वह पहले से है, उसके अंदर और कुछ नहीं है जो बाहर आने की चाह रखता है ।

पर हमारी पहली पहचान तो सिर्फ़ एक लिबास है जिसे हमारी रूह ने ही हमारे लिए चुना है । इन लिबासों के पीछे हम सब एक ही हैं, हम सब इनसान ही हैं । और जब तक हमें अपनी इनसानियत और दूसरों की इनसानियत पर यक़ीन नहीं होगा तब तक डर हमारे दिल-ओ-दिमाग़ को तंग बनाए रखेगा और हम कभी आज़ाद नहीं हो पाएँगे, शायद कभी इस पहली पहचान के आगे नहीं बढ़ पाएँगे । यह डर ही है जो हमें हमारी पहली पहचान से जोड़े रखता है । आख़िरी साँस तक हम इस लिबास को ढोए चले जाते हैं, भले ही अंत में यह एक फटे-पुराने कपड़े का चिथड़ा ही क्यों न बन गया हो ।

पर इस लिबास के पीछे, इस पहली पहचान के परे एक ऐसा मुक़ाम भी है जहाँ हम अस्तित्व के सामने बेलिबास खड़े होकर उसकी ऊर्जा से अपनी ज़िन्दगी में एक नई स्फूर्ति ला सकते हैं और कई ऐसे काम कर सकते हैं जिनकी अभी कल्पना करना भी असंभव है ।

शुक्र है कि दुनिया में आज भी ऐसे कुछ शख़्स बाक़ी हैं जो अपनी ख़ुद की तराशी शख़्सियत के बलबूते पर कई कारनामे कर रहे हैं । किसी को भी इस बात का इल्म नहीं कि क्या उसकी क़िस्मत में भी यह लिखा है या नहीं, पर हम कोशिश तो कर ही सकते हैं । कभी-न-कभी, किसी-न-किसी जन्म में शायद इस पहली पहचान से निजाद मिल ही जाएगी ।

 

 

 

 

 

 

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