लम्हे सुकून के

मिलते हैं ज़िन्दगी में लम्हे सुकून के कमतर ही

जाती है थोड़ी दूर यह कश्ती ज़िन्दगी की

और जस्बातों के तूफ़ान में गुम हो जाती है ।

 

कहते हैं इस भवँर के पार है साहिल-ए-ख़ुशी कहीं

पर जाने किसी बिरले की ही नाँव वहाँ पहुँच पाती है ।

हम जैसों के नसीब में तो बस मुद्दती है चैन भी

इधर संभले नहीं की दूसरी लहर बहा ले जाती है ।

2 thoughts on “लम्हे सुकून के”

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