ज़ख़्म

जब रखा सीने पर हाथ उन्होंने तो रूह हमारी जैसे सिहर सी उठी जब उतरा गिरेबान सिर से मेरे तो सूखे ज़ख़्मों की परत जैसे उखड़ सी गई

ख़्वाब आपका

कल रात-भर आपके ख़याल ने हमें न छोड़ा कितना हसीन वह ख़्वाब था जिसे भोर हमने आँसुओं में बहाके तोड़ा   क्या कशिश थी क्या चुभन थी क्या तड़पन थी प्यार की वह थी एक शब-ए-जन्नत, जो हमारी मिलन की रात थी पर देख हमें ख़्वाबीदा जो आपने अपना रुख मोड़ा तभी वह रात विदा… Continue reading ख़्वाब आपका