लगता नहीं ग़म से डर

लगता नहीं ग़म से डर डर इस बात से लगता है कहीं खा-खाकर ठोकरें यह दिल पत्थर का ही न बन जाए   देखो इस चमन में यारों हैं गुल भी कई बुलबुल भी कई पर कशिश अब इश्क़ में नहीं इतनी कि वस्ल-ए-गुम-ओ-बुलबुल हो पाए   आज गोश-ए-गुल नाला-ए-बुलबुल के लिए तरस गए आज… Continue reading लगता नहीं ग़म से डर