लगता नहीं ग़म से डर

लगता नहीं ग़म से डर डर इस बात से लगता है कहीं खा-खाकर ठोकरें यह दिल पत्थर का ही न बन जाए   देखो इस चमन में यारों हैं गुल भी कई बुलबुल भी कई पर कशिश अब इश्क़ में नहीं इतनी कि वस्ल-ए-गुम-ओ-बुलबुल हो पाए   आज गोश-ए-गुल नाला-ए-बुलबुल के लिए तरस गए आज… Continue reading लगता नहीं ग़म से डर

लम्हे सुकून के

मिलते हैं ज़िन्दगी में लम्हे सुकून के कमतर ही जाती है थोड़ी दूर यह कश्ती ज़िन्दगी की और जस्बातों के तूफ़ान में गुम हो जाती है ।   कहते हैं इस भवँर के पार है साहिल-ए-ख़ुशी कहीं पर जाने किसी बिरले की ही नाँव वहाँ पहुँच पाती है । हम जैसों के नसीब में तो… Continue reading लम्हे सुकून के