यह इश्क़-विश्क़ कुछ नहीं

जो ख़ुमारी में काटते हैं दिन अपने और रातों को सो न पाते हैं, जाके कह दो उनसे कि यह इश्क़-विश्क़ कुछ नहीं, है बस फ़ितूर-ए-ज़हन यह, न कि मंज़ूर-ए-ख़ुदा है ।

आतिश-ए-इश्क़

जब आतिश-ए-इश्क़ में यह रूह ही हमारी, दहक-दहककर ख़ाक हो जाएगी एक दिन, तो फिर जहन्नुम का डर किसको है-- जहन्नुम तो महबूब के क़दमों में ही लिखा है ।