आज संपूर्णता से मिलन का दिन है

घने बादलों की चादर ओढ़े

बारिश के इंतज़ार में डूबे

इन पेड़ों को देखो, महसूस करो

इनका रोयाँ-रोयाँ आज आनंदित है–

आज वर्षा के चुंबन का दिन है

आज संपूर्णता से मिलन का दिन है ।

 

है पत्ता-पत्ता रहा तड़प

टलेगी यह विरह की घड़ी कब

है टहनियाँ पुकारती चींखती

वर्षा को अपनी ओर खींचती

बादलों से यह प्रकृति है बोलती

बूँदें क्यों ये तुम्हारी हैं आँख-मिचोली खेलतीं ?

 

बोलो कब तक तड़पाओगे ?

कब अपना पानी मुझ पर बरसाओगे ?

हे मेघ देवता मैं हूँ प्यासी

कब तुम मेरी प्यास बुझाओगे ?

 

सुना है न तुमने, यह बारिश का दिन

है अपने मिलन का दिन

तो तुम कब मिलने आओगे ?

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